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दिल्ली सबको अपनाती है। यहॉ एक चौथाई मैथिली-भोजपुरी भाषी है। दिल्ली उन्हें अपना समझती है। उनके भाषा और संस्कृति का सम्मान करती है और वे लोग भी दिल्ली को अपना शहर मानते हैं। मुम्बई को दिल्ली से सबक लेना चाहिए।
ये बातें 24 जनवरी 2010, आई सी सी आर सभागार, आजाद भवन में मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित गणतन्त्रा दिवस कविता-उत्सव के अवसर पर मुख्य अतिथि भाषा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास मंत्री , दिल्ली किरण वालिया ने कही।
इस अवसर पर मॉरिशस से आई साहित्यकार सरिता बुद्वू ने मॉरिशस में भोजपुरी के दशा-दिशा का जिक्र करते हुए वहॉ का एक लोक गीत भी सुनाया।
कविता-उत्सव की अघ्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रो केदार नाथ सिंह और मंच संचालन वरिष्ठ व्यंगकार डॉ रमाशंकर श्रीवास्तव ने किया।
केदार नाथ सिंह ने अपने अघ्यक्षीय भाषण में कहा कि “भोजपुरी साहित्य में मनोज भावुक जैसे युवा कवियों को आगे लाना चाहिए। युवा साहित्यकारों का
आगे आना भोजपुरी साहित्य के हित में है। मैथिली-भोजपुरी अकादमी अगली बार केवल युवा कवियों का ही एक कवि सम्मेलन आयोजित करें।”
अकादमी के सचिव डॉ रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने डॉ केदार नाथ सिंह की बातों का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि बहुत जल्दी हम युवा कवि सम्मेलन आयोजित करेंगे।
कडाके की ठण्ड और कुहासे को चीर-फाडकर आए सुधी दर्शको ने मैथिली-भोजपुरी के लगभग दो दर्जन कवियों को सुना। हर ढंग और हर विधा की कविता पढ़ी गई। हास्यावतार पण्डित कुबेर नाथ
मिश्र विचित्रा छाए रहें। विचित्रा ने “गुलाबी रंग में तहरी कवन इ भेद हो जाला कि तनिको मुस्कुरा देलू त दिल में छेद हो जाला”, से शुरू होकर बागी बलिया की महिमा का बखान तक किया। नाटककार
महेन्द्र प्रसाद सिंह ने अपनी कविता बोनस में हास्य व्यंग के माघ्यम से जिन्दगी की जीजिविषा को बताया। मैथिली कवि रमण कुमार सिंह ने दिल्ली की हालत पर मारक कविता कही।
फिर छन्दबद्व और लयबद्व कविता लेकर आए भोजपुरी के जाने माने गजलकार मनोज भावुक। भावुक जितना अच्छा लिखते है, उससे भी अच्छा गजल
कहते है – “भंवर में डूबियो के आदमी उबर जाला, मरे के बा त उ दरिया किनारे मर जाला” और एक दोहा “पडल हवेली गॉव में भावुक बा सुनसान, लइका खोजे शहर में छोटी मुकी मकान” से भावुक ने समा बॉध दिया। मैथिली कवियों में
गंगेश गुंजन का जवाब नहीं। इग्नु के प्रो शत्रुघ्न कुमार की कविता अम्मा ने दिल को छू लिया। अलका सिंहा और परिचय दास की कविताएं सोचने को मजबूर करती है और श्रोता को
आस्वाद से परे ले जाती है। प्रमोद तिवारी ने मधुर स्वर में पांरम्परिक घुन पर अपनी रचना सुनाई। चन्द्रदेव यादव, राधेश्याम तिवारी, विश्वनाथ यादव, नचिकेता, कामिनी कामायनी, तारानन्द वियोगी, मंजर सुलेमान, रविन्द्र लाल दास, शेपफालिका
वर्मा, सारंग कुमार और सुिस्मता पाठक आदि कवि भी खूब जमें।
खचाखच भरे इस सभागार में न सिपर्फ मैथिली-भोजपुरी बल्कि पंजाबी, बंगाली, सिधी और अन्य भोजपुरी-मैथिली प्रेमी भी मौजूद थे। अकादमी के सचिव परिचय दास ने ध्न्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि इध्र मैने कई अन्य अकादमियों का उत्सव देखा पर
इनमें मैथिली-भोजपुरी अकादमी का कविता-उत्सव सर्वोतम रहा।
कार्यक्रम के अन्त में भोजपुरी समाज के अघ्यक्ष अजित दूबे ने अपना उद्वगार व्यत करते हुए कहा कि बहुत जल्दी भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाएगा।
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